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चीनी मिलें किसानों के लिए मिठास या राजनीतिक छलावा

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आज मैं गोरखपुर से सिवान जा रहा था। रास्ते में मुझे सरदारनगर चीनी मिल नजर आई, अब एक खंडहर जैसा दिख रही — जो कभी बहुत बड़ी मिल थी। हालांकि राजनीति में समय-समय पर कहा गया कि यह मिल फिर चलेगी और हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, लेकिन आज तक वह वादा पूरा नहीं हुआ है।  सरदारनगर मिल को पहले एक बार चलाया गया था, लेकिन प्रयास सफल नहीं रहे। 2012 में इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया और आज तक बंद पड़ा है। यह मिल पूर्व में कई गन्ना किसानों और मजदूरों की जीवन-आधार थी, पर वर्षों से ताला बंद पड़ी है। हम अक्सर घर का सामान खरीदते वक्त अच्छी जाँच-पड़ताल करते हैं, लेकिन सरकार चुनते वक्त वही सतर्कता नहीं रखते। अगर वोट देते समय उतनी ही समझदारी दिखाएँ तो ये परिणाम शायद अलग होते। “सरकारें आएंगी जाएँगी, पर देश और उसके लोग रहना चाहिए।” - Late Atal Bihari Vajpayee Ji. आज लगता है, कुछ लोग सोच भी बदल बैठे हैं: उन्हें लगता है सरकारें रहनी चाहिए, भले ही देश की मूल चीज़ें पीछे छूट जाएँ। ये जो चीनी मिल है, माननीय अमित शाह जी में 2014 में जल्द ही चालू करने की बात की थी। आज लगभग 11 वर्ष हो चुके है, लेकिन सच्चाई पके सामने ह...